*छोटी छोटी बात में आत्महत्या की प्रवृत्ति*



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आजकल देखने में आ रहा है कि मनुष्य बात बात में आत्महत्या कर रहा है ऐसा लगता है कि इंसानी सहन शक्ति बिल्कुल खत्म होती जा रही है आखिर ऐसा क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, ये विचारणीय और ज्वलंत प्रश्न है । प्रतिदिन महानगरीय अखबारों में दो चार घटनाएँ छपी होती है और कुछ नहीं भी छप पाती होंगी मगर होती होंगी जरूर ।
             नाउम्मिदी की अतल गहराइयों में इंसान अपनी जीवन लीला समाप्त करता है लेकिन उसके इस कदम से ना तो वह उस समस्या से निजात पा सकता है ना ही वह अपने लिए या अपने परिवार या समाज के लिए कुछ करने की हालत में होता है इंसानी मन को पढ़ना बहुत ही मुश्किल है कहते हैं कि समुद्र की गहराई में तो झांका जा सकता है परंतु मनुष्य के मन में झांकना बहुत ही मुश्किल है इंसान के मनोविज्ञान, संवेदना, और सोच को समझना बहुत ही दुरूह है ।
        सफलता, शोहरत, पैसा, मान, बड़ाई की चाह में आदमी खोता जा रहा है और इन चीजों में जरा सी कमी हो जाने पर आदमी बहुत ना उम्मीद होकर आत्मघात कर लेता है एक दिन तो सभी को मरना है परंतु स्वयं नहीं यह काम प्रकृतिक हो तो ज्यादा अच्छा है हमारे सामने ऐसे अनेकों प्रसंग आते हैं कि जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी अनेक लोगों ने जीवन जिया और अपने आप को सफलता के शिखर पर स्थापित किया जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत इंसान से खुशियां छीन लेती है चिंता छोड़िए खुश रहिए जीवन में हम जब भी खराब दौर से गुजरते हैं तब मन में यह विचार आता है कि परमात्मा मेरी परेशानी देखता क्यों नहीं है मेरे दुख कम क्यों नहीं करता पर याद रखना जब परीक्षा चल रही होती है तो शिक्षक मौन रहता है ।

         विचारधारा अलग होने से न तो सच्चाई छुप सकती है ना कोई छोटा बड़ा हो सकता है अगर परिवार में कुछ मनमुटाव हो तो बैठ कर बात कीजिए खुद एकांत में बैठ कर सोचिये क्या आप भूखे मर रहे हैं क्या आप भयंकर कभी ठीक नहीं होने वाली बीमारी से ग्रसित हैं क्या आप कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा कर परेशान हो रहे हैं क्या आपके बच्चे पागल, गंजेड़ी, नशेड़ी, जुआरी है इन सब इतने इतने बड़े दुखों के साथ भी लोग जी ही रहे हैं मरने की नहीं सोचते है और आप जरा जरा सी बातों को लेकर मरने की सोचने लगते हो कभी ऐसा ख्याल भी आए तो ठंडे दिमाग से सोचना कि मेरे बाद मेरे पत्नी बच्चों का क्या होगा उन का भरण पोषण कैसे होगा बच्चों की शिक्षा कैसे हो पाएगी पत्नी किस तरह से बच्चों को पालेगी एक क्षणिक आवेश में अपनी जीवन लीला को खत्म कर लेना कहां की समझदारी है ।

        याद रखना कि मृत देह संवाद नहीं करती है पर उस शरीर के स्वामी से जुड़ी स्मृतियां बचे परिवार को पल-पल कचोटती हैं कपूर की मांनिद उड़ जाने वाले समय की यादें अमर होती हैं आज के विखंडित होते परिवार भी इसका एक कारण है एक आध पीढ़ी पहले तक साथ रहने वाले दादी दादा ताऊ ताई या घर के अन्य बुजुर्ग इस तरह की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाए रखते थे या यूं कहिए एक तरह से वह भी काउंसलिंग का कार्य करते थे उनके पास हर समस्या का समाधान होता था पर आज के एकल परिवार में यह सब सुविधा नहीं है 

बहुत-बहुत धन्यवाद

अंतरयात्री कवि शरद अजमेरा भोपाल म प्र

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